Monday, 4 August 2014

ख़ुद के साथ ही रहकर सारी उम्र बिताई हमने तो,
तन्हाई में ख़ामोशी को ग़ज़ल सुनाई हमने तो.

पीछे-पीछे दरिया कितने बहते सारी उम्र रहे,
क़तरा-क़तरा जोड़ के फिर भी प्यास बुझाई हमने तो.

सूरज से भी रिश्तेदारी यूँ तो अपनी रही मगर,
मिट्टी के ही दीये से उम्मीद लगाई हमने तो.

अपनी ख़ुद्दारी ज़मीर को ज़िन्दा रखा उसूलों से,
दुनिया चाहे कहती रहे कि उम्र गंवाई हमने तो.

वचन नहीं तोड़ा कोई भी अपनी जान बचाने  को,
ख़ानदान वाली रघुकुल की रीत निभाई हमने तो.

सच बोले तो सर ना बचेगा जंग में जब ऐलान हुआ,
जान बचाई लोगों ने और आन बचाई हमने तो.

इस दुनिया की धन दौलत और शौहरत चाहे नहीं मिली,
दुआ कमाकर उस दुनिया की करी कमाई हमने तो.

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