Tuesday, 19 August 2014

कुछ कभी गौर से पढ़ा भी है,
इस हथेली पे कुछ लिखा भी है.

मुझको सहरा तो कह रहा है तू,
मेरे बारे में कुछ पता भी है.

मिलता रहता है फासलों से मगर,
मुझमें कोई  तो दुसरा भी है.

तुम हो मालिक मेरे तुम्हें सजदा,
मेरे आगे मगर ख़ुदा भी है.

ख़ाल शेरों की, बूढ़ी तस्वीरें,
इस हवेली में कुछ नया भी है.

छीन कर हर पुराने पत्ते  को,
मुझपे मौसम ने कुछ लिखा भी है.

अपनी ग़ज़लों से ये ज़रा पूछो,
दर्द पैदा कभी हुआ भी है.

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Friday, 15 August 2014

ये भी सच है दरियाओं से अपनी फ़ितरत मिलती है,
लेकिन फिर भी सहराओं से जाकर क़िस्मत मिलती है.

तूफ़ानों के बाद नशेमन फिर से बनाने लगते हैं,
देख परिंदों की हिम्मत को कितनी हिम्मत मिलती है.

जाने कौन-कौन सी दुनिया ढूंढ रहे इस दुनिया में,
ख़ुद में पल तो पल रहने की किसको फ़ुर्सत मिलती है.

हम अपने ज़मीर को गिरवी कब रखने बाज़ार गए,
जान के भी ऐसे लोगों को अच्छी क़ीमत मिलती है.

सूरज के वारिस होकर भी खड़े अँधेरे के आगे,
देख रहे हैं ख़ानदान की किसे वसीयत मिलती है.

दुआ बुज़ुर्गों की पाकर ही हमने ये महसूस किया,
दौलत, शौहरत, शानो-शौक़त और हैसियत मिलती है.

दरग़ाहें आवाज़ लगाने लगती हैं मुझको अक्सर,
ना जाने अब किस फ़क़ीर से अपनी सूरत मिलती है.

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Sunday, 10 August 2014

बिछुड़े बेटे से जैसे मिले कोई माँ,
मुझको ऐसे मिली सूफ़ियों की ज़ुबां.

ख़ुद से हम जब मिले भी तो ऐसे मिले,
बारिशों में मिले जैसे जलता मकाँ.

मैं ज़मीं था मगर मेरी ज़िद ये रही,
मुझको छूने की ख़ातिर झुके आसमां.

मेरा होकर भी तूने रखी दूरियाँ,
तू कहाँ मैं कहाँ, मैं कहाँ तू कहाँ.

पंछियों की तरह मैंने पाला इन्हें,
यूँ नहीं हो गए ख़्वाब मेरे जवाँ.

मेरे बाहर  कड़ी धूप का था सफ़र,
मेरे अन्दर था लेकिन कोई सायबां.   सायबां = छायादार

मेरी नज़रों में तू जो रहा उम्र भर,
मेरी साँसों का चलता रहा कारवाँ.

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Friday, 8 August 2014

मेरा यार इश्क़ के ऐसे इक अफ़साने जैसा है,
लिखा पुराने वक़्त ने लेकिन नए ज़माने जैसा है.

मेरे यार का होना मुझमें कैसा है ये पूछ ना तू,
ख़ुदा के घर में छिपा के रक्खे हुए ख़ज़ाने जैसा है.

मेरा यार तो दीवानों की भीड़ में ही रहता है गुम,
कौन उसे पहचान सकेगा किस दीवाने जैसा है.

मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़ाघर और गुरुद्वारे में गया नहीं,
मेरा यार तो ख़ुद क़ुदरत के इक नज़राने जैसा है.

मेरे यार से जुड़ना लेकिन इतना भी आसान नहीं,
सब के साथ में रहता है लेकिन बेगाने जैसा है.

इस दुनिया से उस दुनिया तक मेरे यार का  है रूतबा,
मेरे यार के नाम का लोहा हर कोई माने जैसा है.

यारी रखकर अपने यार से मैंने जान लिया है ये,
दुनिया में बस यार ही मेरा दिल में  बसाने जैसा है.

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Tuesday, 5 August 2014

मुझमें मेरा कहीं ख़ुदा है कोई,
मेरे बारे में सोचता है कोई.

इश्क़ को मेरे कौन समझेगा,
मैं किसी का हूँ ढूंढता है कोई.

कल तलक़ अजनबी समझता था,
अब दुआओं में मांगता है कोई.

जब करूँ नेकियाँ तो लगता है,
मेरे अन्दर भी झांकता है कोई.

मुझको बिस्तर सुबह बताते हैं,
मेरे सोने पे जागता है कोई.

साथ जैसे फ़क़ीर चलता हो,
उम्र मुझमें भी काटता है कोई.

अपनी फ़ितरत से मैं भी सूफ़ी हूँ,
हूँ किसी का मैं पालता है कोई.

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Monday, 4 August 2014

ख़ुद के साथ ही रहकर सारी उम्र बिताई हमने तो,
तन्हाई में ख़ामोशी को ग़ज़ल सुनाई हमने तो.

पीछे-पीछे दरिया कितने बहते सारी उम्र रहे,
क़तरा-क़तरा जोड़ के फिर भी प्यास बुझाई हमने तो.

सूरज से भी रिश्तेदारी यूँ तो अपनी रही मगर,
मिट्टी के ही दीये से उम्मीद लगाई हमने तो.

अपनी ख़ुद्दारी ज़मीर को ज़िन्दा रखा उसूलों से,
दुनिया चाहे कहती रहे कि उम्र गंवाई हमने तो.

वचन नहीं तोड़ा कोई भी अपनी जान बचाने  को,
ख़ानदान वाली रघुकुल की रीत निभाई हमने तो.

सच बोले तो सर ना बचेगा जंग में जब ऐलान हुआ,
जान बचाई लोगों ने और आन बचाई हमने तो.

इस दुनिया की धन दौलत और शौहरत चाहे नहीं मिली,
दुआ कमाकर उस दुनिया की करी कमाई हमने तो.

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Sunday, 3 August 2014

माना ये कि शापित चम्बल, ना तू है ना मैं ही हूँ,
लेकिन सच है कि गंगाजल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

मिट्टी के दीयों ने सारी रात जलाकर पाला था,
माँ का वही बनाया काजल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

भीतर से भी खुल सकते हो, बाहर से भी खुलते हों,
ऐसे दरवाज़े की सांखल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

अपनी-अपनी खुशबु से पहचान बना ली दोनों ने,
चन्दन वन जैसा विन्ध्याचल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

साँसों की सुर-ताल के आगे, बजती है जो हर इक पल,
समय के पांवों की वो पायल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

दूर देश से आकर बरसें, खेतों और खलिहानों में,
बरसने वाला वो इक बादल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

बूढ़े इक फ़क़ीर ने जिसको, ओढ़ा और बिछाया था,
रूह में लिपटा हुआ वो कम्बल, ना तू है ना मैं ही हूँ.

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