Thursday, 3 July 2014

रेत के ऊपर उड़ते बादल जैसा तू,
या फिर माँ के उड़ते आँचल जैसा तू,

घुंघरू बनकर बज उठते हैं शाम-सुबह,
दुल्हन के पांवों की पायल जैसा तू.

ताक में जैसे जलता दीया रखा हुआ,
और दीये में पलते काजल जैसा तू.

तुझमें उगे हुए पेड़ों के जैसा मैं,
दूर-दूर तक फैले जंगल जैसा तू.

तेरे पीछे बच्चों जैसा फिरता हूँ,
दीवाना है या फिर पागल जैसा तू.

मन मेरा है लिपटे हुए कलाये सा,   (कलाये = कलाई में बाँधने वाला धागा)
मुझमें उगे हुए इक पीपल जैसा तू.

मुझमें ग़ज़लों का गुलज़ार बगीचा है,
कूक रहा है जिसमें कोयल जैसा तू.

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Wednesday, 2 July 2014

उम्र का इक-इक लम्हा रोता रहता है,
बहते हुए भी दरिया रोता रहता है.

मेरे क़दमों मी मायूसी को पढ़कर,
सफ़र में अक्सर रस्ता रोता रहता है.

अजब शख्स है हँसता भी है तो उसके,
कंधे पर इक चेहरा रोता रहता है.

कौन है ये दीवाना जो मुझमें आकर,
तन्हा बैठ के हँसता-रोता रहता है.

गाँव छोड़ कर जब से शहर गई है माँ,
तुलसी का इक पौधा रोता रहता है.

कमरे में माँ-बाप ठिठोली करते हैं,
घर की छत पर बच्चा रोता रहता है.

पेड़ों को अहसास है इसका शिद्दत से,
शाख़ से टूट के पत्ता रोता रहता है.

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DD Rajasthan Mushaira in Which Surendra Chaturvedi Participated

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Tuesday, 1 July 2014

तुझसे जब-जब भी आशिक़ी होगी,
मेरे होठों पे शायरी होगी.

मैं हूँ सूरज ये मैंने जान लिया,
मैं जलूँगा तो रौशनी होगी.

भीगता मैं रहुंगा भीतर से,
ऐसी बरसात भी कभी होगी.

लौट आया है तू जुदा होकर,
मुझमें कुछ बात तो रही होगी.

मैं किनारों की शक्ल ले लूँगा,
पास जब नूर की नदी होगी.

मुझको जिस हाल में रखेगा तू,
मुझको उस हाल में ख़ुशी होगी.

मैं समंदर को पी के प्यासा रहूँ,
मेरी ख्वाहिश ये आख़िरी होगी.


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