Sunday, 8 June 2014

किसी भी मोड़ पर मिल जाएँ ये सोचा भी करते हैं,
कभी बाहर, कभी भीतर तुझे ढूँढा भी करते हैं.

नहीं देखेंगे तेरा अब कभी चेहरा ये कहकर भी,
तुझे हम दूर तक जाते हुए देखा भी करते हैं.

अलग होने से अब तक कोई भी मंज़र नहीं बदला,
अभी भी याद करके हम तुझे रोया भी करते हैं.

तुम्हारे जानने वालों के नखरों को उठाकर हम,
नहीं जैसा किया था अब तलक वैसा भी करते हैं.

तुम्हारी ही क़सम अब तक बची महफ़ूज़ है वरना,
क़सम खाया भी करते हैं क़सम तोड़ा भी करते हैं.

वो ख़त जिनको कभी तुमने मसल कर फाड़ डाला था,
उन्हें आपस में फिर से आजकल जोड़ा भी करते हैं.

बिताए साथ जो लम्हे क़सम उनकी तुम्हें जानम,
सुलह जिसमें ना हो ऐसा कभी झगड़ा भी करते हैं.

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ज़मीं पे ला के अम्बर रख दूँ,
तुझमें एक समंदर रख दूँ.

बन जाऊं मैं अगर परिंदा,
जहाँ भी चाहूँ मैं घर रख दूँ.

रोना है जी भर कर मुझको,
कंधे पर तेरे सर रख दूँ.

तुझे तसल्ली मिल जाए तो,
मैं सीने पर पत्थर रख दूँ.

आंधी से तू अगर बचा ले,
कच्चे घर पर छप्पर रख दूँ.

गर मेरी उड़ान पर शक़ है,
काट के मैं अपने पर रख दूँ.

सफ़र में तू भी साथ चले तो,
छिपा के मैं सारे डर रख दूँ.


Friday, 6 June 2014

भरा हुआ बादल हूँ मैं,
लेकिन कुछ पागल हूँ मैं.

अंधे मुझको लगा रहे,
ये कैसा काजल हूँ मैं.

खुले हुए दरवाज़े की,
जैसे इक साँकल हूँ मै.

कौन पूछने आएगा,
कटा हुआ पीपल हूँ मैं,

बोतल में ही क़ैद रहा,
लेकिन गंगाजल हूँ मैं.

मुझको तुम क्या ओढ़ोगे,
क़ैदी का कम्बल हूँ मैं.

मैं पैबंद हूँ बोरी का,
वर्ना तो मखमल हूँ मैं.

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Thursday, 5 June 2014

मेरी आँखों में सहराओं का मंज़र सो रहा है,
मगर भीतर कहीं मेरे समंदर सो रहा है.

वही है ये कि जिसने सारी दुनिया जीत ली थी,
खुली है मुट्ठियाँ देखो सिकंदर सो रहा है.

यहाँ पर बेगुनाहों को नहीं आती हैं नींदे,
सितम करके यहाँ लेकिन सितमगर सो रहा है.

है बच्चा गोद में माँ की तो मुझको लग रहा ये,
ज़मीं की गोद में जैसे कि अम्बर सो रहा है.

नहीं सुल्तान चाहे सो सका फूलों के ऊपर,
मगर काटों के बिस्तर पर क़लन्दर सो रहा है.

अभी जागेगा सारे ग़म करेगा दूर तेरे,
अभी कुछ देर को शायद पयम्बर सो रहा है.     (पयम्बर = ईश्वर का अवतार)

बड़ी मुद्दत से मैं नींदों में जिसकी जागता हूँ,
कोई तो शख्स है जो मेरे अन्दर सो रहा है.

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Wednesday, 4 June 2014

इक गणित की क़िताब जैसा है,
तेरा रिश्ता हिसाब जैसा है.

तुझसे जुड़ना है नींद के जैसा,
टूटना भी तो ख़्वाब जैसा है.

होक मदहोश झूमने के लिए,
तेरा होना शराब जैसा है.

कितना इतरा रहा है अपने पर,
दर्द चढ़ते शबाब जैसा है.

उसके आगे मैं इक अँधेरा हूँ,
और वो आफ़ताब जैसा है.     (आफ़ताब = सूरज)

मेरा अंदाज़ और मेरा लहज़ा,
तेरे ख़त के जवाब जैसा है.

लोग कहते हैं मेरी ग़ज़लों में,
कोई पौधा गुलाब जैसा है.

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जब जिसने तेरा अफ़साना सुना दिया,
सज़दे में मैंने अपना सर झुका दिया.

आसमान के  गिर जाने का डर था उसे,
उसने घर की छत से पंछी उड़ा दिया.

हवा ना साया, फूल ना खुशबु फल देगा,
आँगन में ये कैसा पौधा उगा दिया.

मैंने उसकी ज़ीश्त के पन्ने जब खोले,       (ज़ीश्त = ज़िन्दगी)
उसने मेरी मौत का मुद्दा उठा दिया.

ख़ुद्दारी में तेरा सर तो झुका नहीं,
भीड़ ने उसको देख मसीहा बना दिया.

फिर से मेरा नाम वो लिखना सीख रहा,
जिसका मैंने नाम कभी का मिटा दिया.

जिसके घर पर ग़ज़लों पर पाबन्दी थी,
उसको भी इक शेर तो मैंने सुना दिया.

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Monday, 2 June 2014

जिस्म जुदा हो जाए तो होता है क्या,
रूह से जुड़कर रिश्तों को सोचा है क्या.

मेरे अश्क़ पौंछने तो तुम आए हो,
बहते दरिया को तुमने रोका है क्या.

ना फटती, ना मैली होती, ना धुलती,
तुमने ऐसी चादर को ओढ़ा है क्या.

तुझमें मेरा होना भी अब पूछे है,
तेरे मेरे बीच कोई पर्दा है क्या.

मेरी आँखों में भी आँखें डाल ज़रा,
हाथों से आँखें ढक कर रोता है क्या.

मांझी के अंधे यक़ीन ने तुझको भी,
बीच भंवर में ले जाकर छोड़ा है क्या.

मेरे हर इक शेर पे आँहें भरता है,
मेरी ग़ज़लों से तेरा रिश्ता है क्या.

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