Wednesday, 28 May 2014

ये भी सच है साथ निभाना मुश्किल था,
दिल से लेकिन नाम मिटाना मुश्किल था.

आईनों ने किया था इतना शर्मिंदा,
ख़ुद को ख़ुद की शक्ल दिखाना मुश्किल था.

गर ना हौंसले तैराकी सीखे होते,
उस दरिया को तैर के जाना मुश्किल था.

हम ज़मीर को वहां से ज़िन्दा ले आये,
जहाँ से वापस लौट के आना मुश्किल था.

ग़म के ऐसे बाज़ारों में हम थे जहाँ,
ज़ख़्म बेचकर दर्द कमाना मुश्किल था.

काठ की हांडी बनकर जो रिश्ते आए,
उन्हें आग पर फिर से चढ़ाना मुश्किल था.

जिस महफ़िल में सिर्फ़ मसखरे बैठे थे,
उसमें अपनी ग़ज़ल सुनाना मुश्किल था.

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Tuesday, 27 May 2014

उसने वापस लौट के आना छोड़ दिया,
मैंने भी आवाज़ लगाना छोड़ दिया.

गले लगाना उसने नामंज़ूर किया,
मैंने उससे हाथ मिलाना छोड़ दिया.

उसने मुझसे यादें वापस क्या मांगी,
मैंने भी वो बड़ा ख़ज़ाना छोड़ दिया.

हँसते-हँसते जहाँ उम्र काटी मैंने,
रोते-रोते वही ठिकाना छोड़ दिया.

उसने पूछा जियोगे तुम अब कैसे,
मैंने हाथों से पैमाना छोड़  दिया.

जंगल जैसा जब महसूस हुआ मुझको,
शहर में मैंने आना-जाना छोड़ दिया.

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Monday, 26 May 2014

पाप बहा कर पुण्य कमाने आते हैं,
मुझमें अक्सर लोग नहाने आते हैं.

वही लोग अपना कह देते हैं मुझको,
जो मुर्दों का बोझ उठाने आते हैं.

इक दीवार गुनाहों की हूँ मैं जिस पर,
लोग रात को नाम मिटाने आते हैं.

भीतर मेरे आने से डरते हैं सब,
बाहर से आवाज़ लगाने आते हैं.

उसकी घर में तन्हाई मिलती शोर नहीं,
जिस घर में अक्सर दीवाने आते हैं.

उस से भी मिलने को मन करता है क्यूँ,
जिसे जुदा होने के बहाने आते हैं.

जिन लम्हों ने कभी अलविदा कहा मुझे,
वो लम्हे अब मुझे बुलाने आते हैं.

जो आईने टूट गए ख़ुद के आगे,
वो भी अब मुझसे टकराने आते हैं.

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Sunday, 25 May 2014

मुद्दतों बाद मेरी सोच का मानी निकला,
शख्स जो दिल में बसा था वो कहानी निकला.

मुद्दतों बाद मेरे दर्द को छुआ उसने,
मुद्दतों बाद मेरी आँख से पानी निकला.

वक़्त ने रखके जिसे भूलना बेहतर समझा,
प्यार ऐसी ही कोई चीज़ पुरानी निकला.

उम्र काटी थी कभी जिसने मेरे पहलू  में,
वो ही अहसास मेरा तेरी ज़ूबानी निकला.

टूट के जुड़ने का फिर जुड़ के टूटने का सफ़र,
मेरे दिल का ना कोई दुनिया में सानी निकला.

जिसकी हर एक ख़ुशी मुझसे रही बाबस्ता,
मेरा हर ज़ख्म फ़क़त उसकी निशानी निकला.

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Saturday, 24 May 2014

तन्हाई को जब भी मैं, नज़दीक बुलाता हूँ,
सबसे पहले ख़ुद को ही, आवाज़ लगाता हूँ.

इन उलझी लकीरों में, लिक्खा हो कहीं तू भी,
ये सोच नज़ूमी को, मैं हाथ दिखाता हूँ.        (नज़ूमी = ज्योतिषी)

मत पूछो हवाओं तुम, दरिया के किनारों पर,
मिट्टी पे मैं ऊँगली से, क्या लिखता-मिटाता हूँ.

जब रात परेशाँ हो, मेरे किसी अपने की,
टूटी हुई नींदों में, ख़्वाबों को सजाता हूँ.

जब लौट के आते हैं, अपने हों या बेगाने,
क़दमों से उठाता हूँ, सीने से लगाता हूँ.

रो पड़ता है जब मुझमें, यादों का कोई बच्चा,
जगता हूँ भले ही मैं, पर उसको सुलाता हूँ.

दुश्मन को भी अब फ़ितरत, मालुम है ये मेरी,
वो हाथ बढ़ाते हैं, मैं हाथ मिलाता हूँ.

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Friday, 23 May 2014

वो पढ़ रहा था मुझको, मैं उसकी क़िताब था,
उसके हर इक सवाल में मेरा जवाब था.

लुटने का मुझको नींद में अफ़सोस है यही,
छीना गया जो आँख से वो उसका ख़्वाब था.

मैं उसको हंसाता ही रहा सोच कर यही,
मैं जानता था रोना उसे बेहिसाब था.

होठों से छीनता रहा मरने की दुआएं,
जीने से मेरे दुनिया का खाना ख़राब था.

करनी पड़ी थी उसको अंधेरों से बग़ावत,
आँखों में क्योंकि उगता हुआ आफ़ताब था.     (आफ़ताब = सूरज)

मंज़िल नहीं थी कोई कहीं जानते हुए,
गुज़रा जो सफ़र साथ में वो लाजवाब था.

वो शख्स जिसकी मुट्ठियाँ ना वक़्त से खुलीं,
शायद उसी की मुट्ठियों में इन्क़लाब था.

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Thursday, 22 May 2014

इस दुनिया में कोई हमारा है कि नहीं,
अपना भी जीने का सहारा है कि नहीं.

कश्ती ने घबरा कर आख़िर पूछ लिया,
इस दरिया का कोई किनारा है कि नहीं.

मैंने कुछ भी किया मगर यह जान के ही,
उसका मेरी तरफ़ इशारा है कि नहीं.

उम्र काटनी है तो उस से  पूछ भी लो,
साथ में रहना उसे गवारा है कि नहीं.

जा तो रहे हो छोड़ के लेकिन सोच भी लो,
इस घर में फिर  आना दुबारा है कि नहीं.

ऐतबार उस पर दोनों का है लेकिन,
वो मेरा है मगर तुम्हारा है कि नहीं.

घर का मौसम पूछ रहा है आँगन से,
आसमान में कोई सितारा है कि नहीं.

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