Monday, 14 April 2014

वो मेरा तो सारे मंज़र मेरे हैं,
ज़मीं आसमां और समन्दर मेरे हैं.

साँसें लेते हैं मेरे अहसासों में,
जितने भी हैं मिट्टी के घर मेरे हैं.

मक़सद एक था साथ में जीने मरने का,
इसीलिए सब कटे हुए सर मेरे हैं.

दुनिया से कम ख़ुद से ज्यादा डरता हूँ,
मुझमें जो ज़िन्दा हैं वो डर मेरे हैं.

दिल की बात जुबां पर ख़ुद आ जाती है,
ये तिलिस्म, ये जादू मंतर मेरे हैं.

जिन महलों के क़द की बातें करते हो,
गौर से देखो नींव के पत्थर मेरे हैं.

अपने-अपने वक़्त को जो गाते रहते,
इस दुनिया के सभी सुखनवर मेरे हैं.

सुखनवर (शायर)



Friday, 11 April 2014

मुझमें से आवाज़ लगाता है कोई,
मुझको अपने पास बुलाता है कोई.

मुझको ढूँढने आएगी इक नई सुबह,
कहकर सारी रात जगाता है कोई.

सूने ख़ाली घर में ये क्यूँ लगता है,
जैसे इसमें आता-जाता है कोई.

मैं हूँ तेरे हर्फ़-हर्फ़ में ये कहकर,
मुझको मेरी ग़ज़ल सुनाता है कोई.

सदियों पहले जिनसे रिश्ता टूट गया,
उन यादों को साथ में लाता है कोई.

लगता है जैसे पानी की लहरों पर,
लिखकर मेरा नाम मिटाता है कोई.

मेरी तन्हाई का शायद दुश्मन है,
जब हँसता हूँ मुझे रुलाता है कोई.


Thursday, 10 April 2014

इन आँखों में हर इक मंज़र उसका है,
क़तरा हूँ मैं और समंदर उसका है.

दरवाज़े पर तख्ती है चाहे मेरी,
रहता हूँ मैं जिसमें वो घर उसका है.

उसने जब लिख लिया हथेली पर अपनी,
कहाँ है मेरा अब तो मुक़द्दर उसका है.

अजब हमारे बीच गुफ़्तगू है जिसमें,
हर सवाल मेरा है उत्तर उसका है.

आंधी और तूफ़ान हैं मेरी  ठोकर में,
मेरे घर की नींव में पत्थर उसका है.

तोड़ लिए हैं महलों से रिश्ते अब तो,
जिस  पर सर झुकता है वो दर उसका है.

दुनिया के पिंजरे से छूटा पंछी हूँ,
अब उड़ान उसकी है अम्बर उसका है.

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Tuesday, 8 April 2014

मुझको तेरे नूर का हिस्सा कहते हैं,
अब तो लोग मुझे भी दरिया कहते हैं.

जब से तेरा हुआ हूँ मेरे बारे में,
मेरे अपने जाने क्या क्या कहते हैं.

तू मुझमें दिखता है कोई भी देखे,
लोग मुझे अब तेरा आईना कहते हैं.

घर की सूनी दीवारें रो पड़ती हैं,
सन्नाटे जब मेरा क़िस्सा कहते हैं.

बंद पड़ा कमरा हूँ यादों का जिसको,
बस मकड़ी के जाले अपना कहते हैं.

नींद में मेरे ख़्वाबों की हिम्मत देखो,
मुझे जगा कर उल्टा-सीधा कहते हैं.

तू आए तो शायद ज़िन्दा मान भी लें,
अभी तो दुनिया वाले मुर्दा कहते हैं.

Monday, 7 April 2014

हवा के तेवर जब भी बदलने लगते हैं,
जंगल ख़ुद की आग में जलने लगते हैं.

बच्चों जैसे क़दम हैं मेरी क़िस्मत के,
चलने लग जाएँ तो चलने लगते हैं.

आवाज़ें दीवारें देने लगती हैं,
घर से जब हम दूर निकलने लगते हैं.

क़लम हमारे हाथों में आ जाता है,
जब भी हम शमशीर में ढलने लगते हैं.

हँसता है सूरज ख़ुद के ढल जाने पर,
जुगनू भी जब आग उगलने लगते हैं.

कितनी घुटन हुआ करती है मौसम में,
जब झोंके फूलों को मसलने लगते हैं.

मैं इक ऐसी वारदात का हिस्सा हूँ,
देख के जिसको लोग सम्भलने लगते हैं.

Sunday, 6 April 2014

जाने कौनसे मुझमें ख़ज़ाने ढूंढें है,
रोज़-रोज़ मिलने के बहाने ढूंढें है.

जब से बस्ती में लौटा है जंगल से,
हर घर में जाकर वीराने ढूंढें है.

आँखों में आज़ादी क़ैद रहे चाहे,
पिंजरे में भी पंछी दाने ढूंढें है.

अपने चेहरे से शर्मिंदा है इतना,
शीशों के घर में तयखाने ढूंढें है.

ख़ुद की कहानी रखकर मेरी आँखों में,
जाने वो किसका अफ़साने ढूंढें है.

किसकी इबादत में है गुम वो ही जाने,
मस्ज़िद से आकर बुतखाने ढूंढें है.

मंदिर-मस्ज़िद गुरुद्वारों में तुम जाओ,
अपना दिल तो अब मयखाने ढूंढें  है.

Wednesday, 2 April 2014

पता नहीं है कौन जो जलता रहता है,
मुझमें तो बस मोम पिघलता रहता है.

अजब तरह की धूप निकलती है मुझमें,
जिस्म से आगे साया चलता रहता है.

नींद की ऊँगली थाम के अक्सर रातों में,
बच्चों जैसा ख़्वाब मचलता रहता है.

रूह को अक्सर होता है अहसास यही,
मुझमें कोई जिस्म बदलता रहता है.

ना ढलता ना उगता है उसका सूरज,
मेरा सूरज उगता ढलता रहता है.

जाने कहाँ पर खो देता है ख़ुद को वो,
लेकिन घर से रोज़ निकलता रहता है.

कभी तो आके मुझमें समां जा तेरे बिना,
मुझको अपना होना खलता रहता है.